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UP News: उत्तर प्रदेश में सपा-कांग्रेस गठबंधन पर संकट, इमरान मसूद के बयान से बढ़ी दरार की आशंका

गठबंधन की गांठें ढीली, कांग्रेस दिखा रही अलग राह पर चलने के संकेत...

By: Abhinav Tiwari  RNI News Network
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UP News: उत्तर प्रदेश में सपा-कांग्रेस गठबंधन पर संकट, इमरान मसूद के बयान से बढ़ी दरार की आशंका

उत्तर प्रदेश की राजनीति एक बार फिर करवट लेती नज़र आ रही है। कांग्रेस सांसद इमरान मसूद के ताज़ा बयान ने सपा-कांग्रेस गठबंधन में आई दरार को सार्वजनिक कर दिया है। मसूद ने साफ कर दिया कि 80 में 17 सीटों का पुराना फॉर्मूला अब मंज़ूर नहीं। उनका कहना है कि कांग्रेस अब किसी को हराने या जिताने के लिए नहीं, बल्कि अपने आधार को दोबारा स्थापित करने के लिए चुनाव लड़ेगी।

सियासी तल्खी के दो प्रमुख मौके

गठबंधन में खटास की शुरुआत संभल हिंसा के बाद दिखी, जब राहुल-प्रियंका वहाँ जाना चाहते थे और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अप्रत्यक्ष रूप से तंज कसा। वहीं, जब सपा लोकसभा में इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाना चाहती थी, कांग्रेस ने दूरी बना ली, जिससे अखिलेश की नाराजगी और बढ़ गई।

गठबंधन में कौन रहा फायदे में?

गठबंधन के पिछले दो बड़े चुनावों पर नजर डालें तो समाजवादी पार्टी (सपा) का प्रदर्शन कांग्रेस की तुलना में कहीं बेहतर रहा है।

🔹2017 विधानसभा चुनाव में सपा का स्ट्राइक रेट 15.77% जबकि कांग्रेस का महज 6% था।
🔹2024 लोकसभा चुनाव में सपा का स्ट्राइक रेट 59% और कांग्रेस का 35% रहा।

लेकिन, कम सीटों पर लड़ने की वजह से कांग्रेस के कार्यकर्ता हतोत्साहित हुए और कई क्षेत्रों में संगठन कमजोर हुआ। हालांकि, गठबंधन ने कांग्रेस को यूपी में दोबारा प्रासंगिक ज़रूर बनाया।

क्यों टूट रही है गठबंधन की डोर?

गठबंधन में पहली दरार तब दिखी जब यूपी में 10 विधानसभा सीटों के उपचुनाव के लिए कांग्रेस ने 2-3 सीटों की मांग रखी, लेकिन सपा ने उन्हें भाजपा के मज़बूत कैंडिडेट्स वाली सीटें दे दीं। कांग्रेस ने उपचुनाव से खुद को अलग कर लिया और सपा को केवल दो सीटों पर जीत मिली।

इसके बाद बदले की कार्रवाई में सपा ने दिल्ली विधानसभा चुनाव में AAP को समर्थन दे दिया, जबकि कांग्रेस गठबंधन में थी। अब सपा बिहार में राजद को समर्थन देने जा रही है, जिससे कांग्रेस फिर नाराज़ है।

कांग्रेस की रणनीति में बड़ा बदलाव

कांग्रेस अब किसी गठबंधन के भरोसे नहीं रहना चाहती। उसने हाल ही में 134 ज़िला अध्यक्षों की नियुक्ति की, जिसमें मुस्लिम, ओबीसी, दलित और ब्राह्मण वर्ग को प्राथमिकता दी गई। इससे स्पष्ट है कि कांग्रेस अपने पुराने सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूले की ओर लौट रही है, जो 85% जनसंख्या को जोड़ने की कोशिश है।

इमरान मसूद ने भी साफ कर दिया है कि अब कांग्रेस 17 सीटों पर नहीं मानेगी। उनका इशारा 175-200 सीटों की डिमांड की तरफ था, हालांकि उन्होंने सटीक संख्या बताने से परहेज किया और निर्णय को राहुल-प्रियंका पर छोड़ दिया।

क्या गठबंधन की उम्मीदें अब खत्म?

राजनीतिक जानकार मानते हैं कि गठबंधन की संभावना अब कमजोर पड़ रही है। दोनों दलों के बीच भरोसे की कमी और ‘सम्मानजनक साझेदारी’ की जिद इसे और जटिल बना रही है।

🔹कांग्रेस अब अपने दम पर चुनाव लड़ने की तैयारी में है।
🔹सपा अन्य क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर विकल्प तलाश रही है।

सपा का वोटबैंक और कांग्रेस का पुनर्जागरण

🔹सपा का वोटबेस (2022 में 32%) और संगठन कांग्रेस से मजबूत है।
🔹लेकिन अगर गठबंधन टूटा, तो वोटों का बंटवारा भाजपा को लाभ पहुंचा सकता है।
🔹वहीं कांग्रेस को उम्मीद है कि 2027 तक वह अपनी खोई हुई जमीन दोबारा पा सकती है।

इतिहास क्या कहता है?

🔹2009 लोकसभा चुनाव कांग्रेस के लिए यूपी में बेहतर प्रदर्शन वाला था—21 सीटें और 18.25% वोट शेयर।
🔹2012 विधानसभा चुनाव सपा के लिए सर्वश्रेष्ठ रहा—224 सीटें और 29.15% वोट शेयर।
🔹2017 में गठबंधन कर लड़ने पर सपा को 47 और कांग्रेस को 7 सीटें ही मिली थीं।
🔹2024 में दोनों ने मिलकर 43 सीटें जीतीं, लेकिन कांग्रेस को कम सीटें मिलीं और सपा फायदे में रही।

क्या 2027 में राहें जुदा होंगी?

राजनीतिक संकेत साफ हैं—कांग्रेस और सपा दोनों ही अब अपनी शर्तों पर आगे बढ़ना चाहती हैं। जहां कांग्रेस अपने संगठन के पुनर्निर्माण और मजबूत सामाजिक समीकरण के सहारे अकेले चलने की तैयारी कर रही है, वहीं सपा को लगता है कि वह अपने बूते ज्यादा सीटें जीत सकती है। यदि गठबंधन टूटा, तो भाजपा के लिए मुकाबला आसान हो सकता है, लेकिन यूपी की सियासत में नए समीकरण बनना तय है।

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