1991 में सोवियत संघ दुनिया का सबसे बड़ा देश था, लेकिन कुछ ही महीनों में यह पूरी तरह बिखर गया। इसके पीछे कई कारण थे:
अर्थव्यवस्था चरमराई: तेल की कीमतों में गिरावट, बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी ने हालात खराब कर दिए।
रक्षा खर्च का बोझ: अमेरिका से हथियारों की होड़ में भारी खर्च हुआ, जिससे अन्य क्षेत्रों में निवेश कम हो गया।
अफगान युद्ध का असर: 1979-1989 तक चला युद्ध न केवल सैन्य नुकसान लाया, बल्कि जनता में असंतोष भी बढ़ा।
चेरनोबिल हादसा: 1986 की परमाणु त्रासदी ने सरकार की साख गिरा दी, और विश्वास का संकट गहरा गया।
गोर्बाचेव की नीतियां: ग्लासनोस्त (खुलापन) और पेरेस्त्रोइका (पुनर्गठन) से सुधार तो हुए, लेकिन ये बदलाव नियंत्रण से बाहर हो गए।
बर्लिन की दीवार और विद्रोह: 1989 में बर्लिन की दीवार गिरी और कई देश सोवियत प्रभाव से बाहर निकलने लगे।
जनता की सोच में बदलाव: आज़ादी और लोकतंत्र की चाह ने पूरे सिस्टम को हिला दिया।
अंततः 1991 में मिखाइल गोर्बाचेव के इस्तीफे के साथ सोवियत संघ का अंत हो गया। यह विघटन सिर्फ राजनीतिक या आर्थिक नहीं, बल्कि सोच, व्यवस्था और समय का बड़ा बदलाव था।